Surendra Chaturvedi

Ghazal


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Yeh Samandar Sufiyana Hai-Part Five

Posted by surendrachaturvedighazal on September 12, 2012 at 1:35 AM Comments comments (1)

मुद्दत से जो बंद पड़ा था

मैं उस घर को खोल रहा था।

 

ख़ाली घर में सैकड़ों कमरे

हर कमरे में तू रहता था।

 

ख़ाली घर में सैकड़ों कमरे

हर कमरा कुछ बोल रहा था।

 

ख़ाली घर की दीवारों पर

हर सू तेरा नाम लिखा था।

 

ख़ाली घर की छत पर जाकर

कहूँ मैं क्या कितना रोया था।

 

सोच रहा हूँ आज भी मैं ये

ख़ाली घर कितना अच्छा था।

 

 

 

दीवारो दर ढूँढ के ला

जा मेरा घर ढूँढ के ला।

 

उड़ने को हूँ मुद्दत बाद

कोई तो अम्बर ढूँढ के ला।

 

झील की लहरों पर तैरे

ऐसा कंकर ढूँढ के ला।

 

जिसे नजूमी पढ़ ना सकें

अब वो मुक़द्दर ढूँढ के ला।

 

नाबीना आँखों के लिए

कोई तो मंज़र ढूँढ के ला।

 

फूल की ख़ुशबू हो जिसमें

वो इक नश्तर ढूँढ के ला।

 

मुझमें जीये और मरे

ऐसा सुखनवर ढूँढ के ला।

 

 

 

अँधेरों की नज़र से तू बचाकर

उजालों में जलाना चाहता है।

 

सितम आ जायें मुझको रास सारे

मुझे इतना सताना चाहता है।

 

तेरे आगे नहीं हूँ कुछ भी लेकिन

ये तू किसको दिखाना चाहता है।

 

ज़रा गिरते हुए मैं भी तो देखूं

तू किस हद तक गिराना चाहता है।

 

क्या मुझसे चाहता है तू भी वो ही

जो मुझसे ये ज़माना चाहता है।

 

मैं तेरी आग को जि़ंदा रखुंगा

मुझे तू क्यूँ बुझाना चाहता है।

 

 

 

हमीं पर गिरती क्यूँ हैं बिजलियां मालूम कर लेंगे

किसी दिन हम भी ये राजे-निहाँ मालूम कर लेंगे।

 

हमारे हमज़बाँ बनकर कभी तुम खिलखिलाते थे

हुए अब किसलिए हो बेजुबाँ, मालूम कर लेंगे।

 

लगी है आग दिल में यूँ कि हो सूखा कोई जंगल

मगर उठता है क्यूँ दिल में धुआँ, मालूम कर लेंगे।

 

हमारी रूह से रिश्ता रखा था आपने लेकिन

कहाँ दफ़ना दिये हैं जिस्मो-जाँ, मालूम कर लेंगे।

 

हमारी मेहरबानी से तुम्हारे ख़्वाब पलते थे

तुम्हारे कौन हैं अब मेहरबाँ, मालूम कर लेंगे।

 

हमारे नक़्षे-पा पे चलते-चलते रूक गए हो तुम

कहाँ जाकर मिटे कदमो-निशाँ, मालूम कर लेंगे।

 

हमें रहकर कहाँ पर काटनी है उम्र ये सारी

मुक़ामे इश्क़़ का वो आशियां, मालूम कर लेंगे।

 

 

 

 

कोई तो बात अमल में आए

फिर चाहे वो ग़ज़ल में आए।

 

फुटपाथों पर पहले जीये

बाद में चाहे महल में आए।

 

रूह बचेगी, जिस्म कटेगा

यही सोच मक़तल में आए।

 

फूलों ने तो ख़ुशबू दे दी

मज़े सब्र के फल में आए।

 

ख़ुद्दारी जब लगी दाँव पर

हम भी जंगो-जदल में आए।

 

ख़ुदा से मिलकर मिले ना जो सुख

वो माँ के आंचल में आए।

 

दुश्मन बनकर साथ रहे थे

दोस्त वो वक़्ते अजल में आए।

 

 

 

मेरी वीरानियां महक़ा रही हैं

ये ख़ुशबू जब कहाँ से आ रही है।

 

मेरी ख़ामोशियां भी सुन रहीं हैं

तेरी आवाज़ अब तक आ रही है।

 

वो जिसकी याद से तार्रूफ़ नहीं कुछ

मेरी तन्हाईयाँ तड़पा रही हैं।

 

तेरे आने की आहट बेतक़ल्लुफ

मेरे घर आ रही है जा रही है।

 

तेरे होने की बातें कर रहा हूँ

मेरे खोने की नौबत आ रही है।

 

मेरे सीने से लिपटी रो रही है

कि जैसे आरज़ू पछता रही है।

 

 

 

उसकी नज़रों में वफ़ा फिर आई

घर की खिड़की से हवा फिर आई।

 

उसके फिर हाथ उठे हक़़ में मेरे

उसके होठों पे दुआ फिर आई।

 

हिचकियाँ लेने लगी तन्हाई

उसके भीतर से सदा फिर आई।

 

ख़ुद को समझा किया मैं नाबीना

लौट आँखों में जि़या फिर आई।

 

मैं जिसे रख के कहीं भूल गया

वो ही जीने की अदा फिर आई।

 

उसकी चाहत ने फिर सवाल किए

मेरे होंठों पे रज़ा फिर आई।

 

 

 

दूर जा बसे ख़्वाबों जैसी

उसकी याद पहाड़ों जैसी

 

अपने दुख़, अपनी पीड़ायें

हैं कंठस्थ किताबों जैसी।

 

जड़ों में उलझी हुई हसरतें

बूढ़े पेड़ के पांवों जैसी।

 

जिस्म मज़ारों जैसा मेरा

रूह मेरी दरगाहों जैसी।

 

दिल से निकली हुई दुआयें

हैं मुफ़लिस की आहों जैसी।

 

बदन में आती-जाती साँसे

चीख़ रहे कुछ घावों जैसी।

 

तुझको लेकर मेरी चाहत

है बच्चों के पांवों जैसी।

 

 

 

घर के बाहर खड़ा हुआ है

घर का रस्ता भूल गया है।

 

कड़ी धूप में जिस्म गंवा कर

साया चक्कर काट रहा है।

 

ख़ुद में रहक़र इतना तन्हा

बड़ी मुद्दतों बाद हुआ है।

 

नींद का इक नन्हा सा लम्हा

किसकी याद से बिछड़ गया है।

 

चैराहे से गुज़र के उसने

जाने क्या-क्या सोच लिया है।

 

हवा के झौंके से दरवाज़़ा

बहुत दिनों के बाद खुला है।

 

 

 

उसने बिल्कुल सही सुना था

मैंने शायद यही कहा था।

 

होशियारी से काट के उसने

नाम के ऊपर नाम लिखा था।

 

उम्र काट कर उसने मेरी

बदन को तन्हा छोड़ दिया था।

 

जोड़ रहा था वो घर अपना

मैं अपना घर तोड़ रहा था।

 

मुझमें लम्बी दूरी वाला

रस्ता कोई ठहर गया था।

 

बंद पड़े घर की खिड़की से

मैं दरवाज़़े देख रहा था।

 

पाकर मुझको लौट गया वो

और मैं ख़ुद को ढूँढ रहा था।

 

बूढ़ा पेड़ हवा को छू कर

सूख पत्ते तोड़ रहा था।

 

 

 

आँखों में दरिया रोया है

किसने मुझको याद किया है।

 

आंगन ख़ुष, दीवारें हैं ख़ुष

घर की छत को चांद दिखा है।

 

मेरा कोई पुराना चेहरा

मेरे आगे आ बैठा है।

 

तू लौटा तो मैंने दर का

जलता दीया बुझा दिया है।

 

तन्हाई ख़ामोश है लेकिन

ख़ामोशी में शोर मचा है।

 

यादों का इक पागल लड़का

मुझमें आकर नाच रहा है।

 

दीवारों पर चमक रहे हैं

धूप ने किसका नाम लिखा है।

 

 

 

दिल में मेरे जो रहता है

वो आँखों से बोल रहा है।

 

बहते दरिया की आवाज़ें

मुझमें कोई छोड़ गया है।

 

मुद्दत से बस एक कहानी

मैं कहता हूँ वो सुनता है।

 

एक नजूमी मुझमें है जो

फूटी कि़स्मत को पढ़ता है।

 

आसमान का सपना मुझमें

जाने कितनी बार उड़ा है।

 

भूल गया है अब वो मुझको

ख़त में उसने यही लिखा है।

 

 

 

मैं उसका कि़रदार नहीं था

जो यारों का यार नहीं था।

 

मरने को वो साथ था सबके

जीने को तय्यार नहीं था।

 

सहाराओं को ख़ून पिलाया

पानी का हक़़दार नहीं था।

 

मैं था एक ख़ज़ाना जिसका

कोई दावेदार नहीं था।

 

सुनके सदायें जो ना रूकतीं

मैं ऐसी रफ़्तार नहीं था।

 

ज़ख़्म ही सींता रहा हमेशा

सूई था तलवार नहीं था।

 

 

 

ना पूछ मुझसे किधर गया वो

कई ख़ुशबुओं में बिखर गया वो।

 

हर एक लम्हा जिया जो मुझमें

ये कौन कहता है मर गया वो।

 

ताउम्र तन्हाईयाँ मिलेंगी

ये जानकर भी उधर गया वो।

 

ठुकरा दिया उसको दीवारो-दर ने

ना फिर वो लौटा ना घर गया वो।

 

सफ़र में उसको भी नाख़ुदा ने

जहां उतारा उतर गया वो।


Yeh Samandar Sufiyana Hai-Part Four

Posted by surendrachaturvedighazal on September 12, 2012 at 1:30 AM Comments comments (0)

सामने जब बयान रखता है

अपने लहज़े में जान रखता है।

 

बात करता है खुल के मिलने की

फ़ासले दरमियान रखता है।

 

जिस्म की परवरिश में वो अक़्सर

हसरतों को जवान रखता है।

 

साथ रहक़र भी वो फ़रिष्तों के

ख़ुद पे ही इत्मीनान रखता है।

 

नहीं कि़रदार कोई है ख़ुद का

क्या ग़जब दास्तान रखता है।

 

उसके भीतर है आसमान कई

कितनी लम्बी उड़ान रखता है।

 

साथ रहता है वो बुजुर्गों के

जान देकर ज़बान रखता है।

 

 

 

आंधियों में भी चरागों को जलाना होगा

अपनी ग़ज़लों का मुझे जर्फ़ निभाना होगा।

 

दिल की आवाज़ कशिश बनके ना पहुंचे जब तक

ज़ख़्म खा-खा के मुझे दर्द कमाना होगा।

 

चीख़ अपनी हो, पराई हो, किसी की भी हो

आ रही है तो सितमगर से बचाना होगा।

 

अपनी तहज़ीब बचाने के लिए निकला हूँ

जानता हूँ कि खि़लाफ़त में ज़माना होगा।

 

प्यासा रहक़र भी नमाज़ें मैं पढूं काफ़ी नहीं

जब यज़ीदों से मुझे सर भी कटाना होगा।

 

रोज़ सूरज की तरह घर से निकलने वाले

धूप ढलते ही तुझे लौट के आना होगा।

 

 

 

गरचे पूरा जिस्म तेरा है

क्यों उस पर मेरा चेहरा है।

 

जेहन बड़ा हैरान है मेरा

मुझमें तू क्यों बोल रहा है।

 

तू गर मेरे साथ है तो फिर

कौन हुआ मुझमें तन्हा है।

 

उम्र ना पूछ मेरे ज़ख़्मों की

मुझसे मेरा दर्द बड़ा है।

 

देख रही है डर के कुल्हाड़ी

पेड़ के पीछे पेड़ खड़ा है।

 

शाम ढली अब घर जा क्यूँ तू

झोली फैलाए बैठा है।

 

वो आयेगा बात ये सुनकर

मैंने दरवाज़ा खोला है।

 

 

 

रास्ता तक नज़र नहीं आता

मुझको करना सफ़र नहीं आता।

 

इश्क़ की धूप है ये अ-नादाँ

रास्तों में शजर नहीं आता।

 

एक भूला हुआ मज़ार हूँ मैं

कोई रोने इधर नहीं आता।

 

कहीं नाराज़ तो नहीं है ख़ुदा

क्यूँ दुआ में असर नहीं आता।

 

देवता रह रहे हैं बस्ती में

रहने कोई बशर नहीं आता।

 

रोशनी की नज़ीर हूँ जैसे

एक अंधा फ़क़ीर हूँ जैसे।

 

न छुड़ाया तो बिक ही जाऊंगा।

गिरवी रक्खा ज़मीर हूँ जैसे।

 

मरे चारों तरफ कमानें हैं

मैं निशाने का तीर हूँ जैसे।

 

कोई पढ़ता नहीं हथेली में

बदनुमा इक लक़ीर हूँ जैसे।

 

उनकी नज़रें यही बताती हैं

उनके दिल की मैं पीर हूँ जैसे।

 

चंद सिक्के लिए खड़े हैं सभी

बिकने वाला कबीर हूँ जैसे।

 

 

 

उलझनों के साथ रहता है

जंगलों के साथ रहता है।

 

पत्थरों से दोस्ती भी है

आईनों के साथ रहता है।

 

प्यार पर उसका यक़ीं देखो

दुश्मनों के साथ रहता है।

 

मर ना जाएं नस्ल इस ख़ातिर

भाईयों के साथ रहता है।

 

दिलबरों की देख कर दुनिया

दिलजलों के साथ रहता है।

 

रेत के रिश्ते निभाने हैं

बादलों के साथ रहता है।

 

ख़ुद को कहता है वो दौलतमंद

शायरों के साथ रहता है।

 

 

 

टूटा-फूटा, जर्जर हूँ

पता नहीं किसका घर हूँ।

 

मुझे अंधेरे पाल रहे

अंधी आँखों का डर हूँ।

 

लिखो अगर तो हूँ क़तरा

पढ़ो तो एक समंदर हूँ।

 

फैला हूँ हर ओर मगर

अपनी हद के अंदर हूँ।

 

मत गुस्से से उठा मुझे

मैं पूजा का पत्थर हूँ।

 

मौसम छोड़ गए तन्हा

खेत हूँ लेकिन बंजर हूँ।

 

सोता है अंबर मुझमें

मैं फ़क़ीर का बिस्तर हूँ।

 

जैसा भी हूँ जो भी हूँ

इस दुनिया से हट कर हूँ।

 

 

 

सफ़र का खोया हुआ सिलसिला कहाँ तक है

हुसैनी दर्द का ये रास्ता कहाँ तक है।

 

नमाज़ें प्यास में भीगी तो हैं लहू से मगर

उन्हें ख़बर है कि ये क़र्बला कहाँ तक है।

 

अभी भी जि़ंदगी बातिल की जंग है लेकिन

यज़ीद जानते हैं वाक़या कहाँ तक है।

 

हमारे सर तो कटे हैं ये पूछ लश्कर से

बता दे सोच के ये सिलसिला कहाँ तक है।

 

सवाल करने से पहले सवाल ये भी तो है

कुराने पाक़ को तूने पढ़ा कहाँ तक है।

 

ख़ुदा से जोड़ना चाहता है ख़ुद को तू लेकिन

किसी के दिल से तेरा दिल जुड़ा कहाँ तक है।

 

तू मुसलमान अगर है तो ये बता मुझको

किसी के हक़ के लिए तू लड़ा कहाँ तक है।

 

 

 

यूँ तो हर कोई जाने मुझको

कौन मगर पहचाने मुझको।

 

यादों की आबादी में भी

रास आए वीराने मुझको।

 

तन्हाई मुझको लिखती है

पढ़ते हैं अफ़साने मुझको।

 

किसी जुलाहे का लिबास हूँ

कहते ताने-बाने मुझको।

 

अजब नशीली हूँ शराब मैं

पीते हैं मयख़ाने मुझको।

 

अलग किस्म का हूँ दीवाना

ये कहते दीवाने मुझको।

 

ढूँढ रहे कई सदियों से

गुज़रे हुए ज़माने मुझको।

 

 

 

सहाराओं का साथ निभाना भूल गया

दरियाओं का दिल बहलाना भूल गया।

 

ऐसी भी जल्दी में क्या था जाने की

जाते-जाते हाथ मिलाना भूल गया।

 

है अफ़सोस मुझे भी तेरी यादों का

रखकर जाने कहाँ ख़ज़ाना भूल गया।

 

किसी मोड़ पर मिले तो ना पहचानेंगे

बात यही ख़ुद को समझाना भूल गया।

 

जिसे किया आबाद मेरी तन्हाई ने

मुझको अब वो भी वीराना भूल गया।

 

दर्द के सारे रिश्ते उसने तोड़ दिये

मैं भी उसको ज़ख़्म दिखाना भूल गया।

 

वो भी मुझको दिला ना पाया याद कभी

मैं भी उसको याद दिलाना भूल गया।

 

 

 

बहते पानी की बात करता था

जि़ंदगानी की बात करता था।

 

जिसका कि़रदार कोई था ही नहीं

उस कहानी की बात करता था।

 

था अजब शख़्स काले नागों से

रातरानी की बात करता था।

 

बादलों को बुला के सहरा में

बागवानी की बात करता था।

 

ध्यान रखता था वो बुजुर्गों का

जब जवानी की बात करता था।

 

मेरा चेहरा पढ़े बगैर ही वो

तर्जुमानी की बात करता था।

 

ना समझ आजकल के बच्चों से

नाना-नानी की बात करता था।

 

 

 

ख़ूबसूरत ख़याल देता है

मुझको मुश्किल में डाल देता है।

 

जब भी छिड़ती है बात ग़ज़लों की

वो कलेजा निकाल देता है।

 

जिनके होते नहीं जवाब कोई

ऐसे-ऐसे सवाल देता है।

 

जब उजाले क़रीब आते हैं

मुझको साये में ढाल देता है।

 

कितना वो मेहरबां हैं इन्सां पर

कैसे-कैसे कमाल देता है।

 

बेवफ़ा होके भी वफ़ा के लिए

ख़ुद वो अपनी मिसाल देता है।

 

बात जब जि़ंदगी पे आती है

बातों-बातों में टाल देता है।

 

 

 

दरो दीवार से ज्यों-ज्यों शनासा होता जाता है

मेरा घर और तन्हा और तन्हा होता जाता है।

 

इरादों को मेरे आकर फ़रिष्ते तोड़ देते हैं

मेरी नज़रों के आगे ये तमाशा होता जाता है।

 

न जाने कितने ही दरिया दुआयें देते हैं फिर भी

समंदर और प्यासा और प्यासा होता जाता है।

 

तेरी बैचेनियां चट्टान को जब तोड़ देती हैं

मेरी ख़ामोशियों का भी खुलासा होता जाता है।

 

ग़मों की मेज़बानी में शरफ़ होता है ये हांसिल

मेरी खि़दमत की दौलत में इजाफ़ा होता जाता है।

 

बहुत ही काम आता है ये दिल राहे मुहब्बत में

मुसलसल चोट लगती है, तजुर्बा होता जाता है।

 

 

 

भरा हुआ पैमाना होना

सीख गया मयख़ाना होना।

 

इश्क़ में मुझको आते-आते

आ ही गया दीवाना होना।

 

मुफ़लिस होकर रास ना आया

शाहों का नज़राना होना।

 

ख़्वाबों का हर्जाना देकर

नींदों पर जुर्माना होना।

 

लिखने वालों को क़बूल है

सुना हुआ अफ़साना होना।

 

जाने क्यूँ मंजूर नहीं था

महलों का तयखाना होना।

 

पाने और खोने का तजुर्बा

होना और रोज़ाना होना।

Yeh Samandar Sufiyana Hai-Part Three

Posted by surendrachaturvedighazal on September 12, 2012 at 1:25 AM Comments comments (1)

 

मैं अंधेरे पे लिखा इक रोशनी का ख़्वाब हूँ

देखती है मौत लेकिन जि़ंदगी का ख़्वाब हूँ।

 

मुझको सहराओं की बेचैनी ने पाला उम्र-भर

या ख़ुदा अब तो बता मैं किस नदी का ख़्वाब हूँ।

 

जो दुआओं की हिफ़ाज़त के लिए जि़ंदा हुआ

ग़ौर से पहचान मैं उसका आदमी का ख़्वाब हूँ।

 

प्यास की शिद्दत मुझे छूती रही कुछ इस तरह

मैं समंदर के लिए अब तिश्नग़ी का ख़्वाब हूँ।

 

जिस्म की दहलीज़ पे पहुंचा तो मुझको यूँ लगा

ख़ुद में रहक़े भी मैं जैसे अजनबी का ख़्वाब हूँ।

 

टूटना दोनों को होगा है लिखा तक़दीर में

तू किसी का ख़्वाब है मै भी किसी का ख़्वाब हूँ।

 

नफ़रतों ने वल्दियत पूछी तो दिल ने ये कहा

ख़ून से लिक्खा हूँ लेकिन दोस्ती का ख़्वाब हूँ।

 

 

 

यादों के घर लौट के जाना मुश्किल है

दरवाज़े फिर से खुलवाना मुश्किल है।

 

खेलो तुम कितने भी नए खिलौनों से

बचपन से फिर हाथ मिलाना मुश्किल है।

 

उनसे भी मैं जुदा नहीं हो पाता हूँ

जिनसे मेरा साथ निभाना मुश्किल है।

 

ख़ुद्दारी के आगे दौलत है मिट्टी

बात मगर ये तय कर पाना मुश्किल है।

 

काग़ज़ की कश्ती में तैर रहा दरिया

ये मंज़र सबको दिखलाना मुश्किल है।

 

रूह में चाहे साँसें वो ही लेता हो

लेकिन उसको तो छू पाना मुश्किल है।

 

जो रहते हर वक़्त दिलों में लोगों के

ऐसे लोगों का मर जाना मुश्किल है।

 

 

 

मुक़म्मल इस तरह भी दास्तां होने नहीं देता

मेरे अहसास को वो आसमाँ होने नहीं देता।

 

कहानी लिख भले ही दे हज़ारों रहनुमाओं की

मेरे कि़रदार का वो तर्जुमा होने नहीं देता।

 

सिखाता है वो उड़ना साथ रखकर हर परिंदें को

मगर ख़ुद का किसी को हमजुबां होने नहीं देता।

 

न जाने कौन लिख जाता है दिल की बात चेहरे पर

मेरी ख़ामोशियों को बेज़ुबां होने नहीं देता।

 

यक़ीं के साथ सौंपी है, मुझे मिट्टी के दीयों ने

मैं अपनी रोशनी को रायगाँ होने नहीं देता।

 

मेरी तन्हाईयों से जब कभी वो बात करता है

सिवा अपने किसी को दरमियां होने नहीं देता।

 

निकलता है उड़ानों पर अजब रूतबे से वो पंछी

हवाओं के सफ़र को आंधियां होने नहीं देता।

 

 

 

बेवफ़ा को याद करता है

वक़्त क्यूँ बर्बाद करता है।

 

कितने भोलेपन से कर डाला।

काम जो जल्लाद करता है।

 

छीन लेता है सभी रस्ते

फिर मुझे आज़ाद करता है।

 

आजकल सूखा हुआ दरिया

बारिशें आबाद करता है।

 

ज़ख़्म वो भरने नहीं देता

दर्द का अनुवाद करता है।

 

कितना नाजुक देखिए है वो

फूल से फ़रियाद करता है।

 

तीसरे के बाद चैथे दिन

कौन किसको याद करता है।

 

 

 

नहीं होगा ये अफ़साना कभी भी मुख़्तसर अपना

कि अब तो हो गया है उम्र से लम्बा सफ़र अपना।

 

कहाँ तक आ गए हैं दूर ख़ुद से भी बिछुड़कर हम

कहाँ होता नहीं था दूर पल भर हमसे घर अपना।

 

पुरानी चाहतों के रास्ते अब भी बुलाते हैं

मगर उन रास्तों से अब नहीं होता गुज़र अपना।

 

तेरी उल्फ़त में ही हम प्यास के सहरा में आए हैं

अगर तू हुक़्म दे दे तो कटा सकते हैं सर अपना।

 

शुरू होता है तुझसे और तुझी पे ख़त्म होता है

न कोई और हो पाया कभी भी उम्र भर अपना।

 

जहां ख़ुशबू के झरने हैं, जहां पे नूर बहता है

बसाया है अलग दुनिया से हमने अब नगर अपना।

 

फ़क़ीरों की दुआ में वो भी शामिल हो गया होता

दिया होता ज़रा सा साथ भी उसने अगर अपना

 

 

 

इक नया ख़ुर्शीद फिर दिल में जगा मौला अली

मैं अँधेरों में हूँ दिखला रास्ता मौला अली।

 

मुझमें तो बस तू ही तू है दूसरा कोई नहीं

कौन मुझमें है भला तेरे सिवा मौला अली।

 

अब मेरी तन्हाईयों मे बोलता कोई नहीं

कुव्वते-गोहाई मुझको कर अता मौला अली।

 

आज भी प्यासी नमाज़ें याद आती है मुझे

आज भी भूला नहीं हूँ क़र्बला मौला अली।

 

या हुसैनी रंग में रंग दे मेरे कि़रदार को

या यज़ीदों को कुचल दे मुर्तज़ा मौला अली।

 

आ गया हूँ मैं भी जैसे शाम के बाज़ार में

तुम ही बतलाओ मुझे अब रास्ता मौला अली।

 

 

 

जब मेरी तन्हाईयों में बेख़ुदी आ जाएगी

इश्क़ में शायद मेरे दीवानगी आ जाएगी।

 

इश्क़ में जब भी मेरे दीवानगी आ जाएगी

मुझमें जीने के लिए ख़ुद जि़ंदगी आ जाएगी।

 

ऐसे इक सूरज से मिलकर आ रहा हूँ दोस्तों

जब अँधेरों से लडूंगा रोशनी आ जाएगी।

 

प्यास की शिद्दत में जब तब्दील हो जाऊंगा मैं

होंठ पे दरियाओं के भी तिश्नगी आ जाएगी।

 

सीख लूं पहले तो मैं बंदानवाज़़ी ठीक से

मुझको करना भी किसी दिन बंदगी आ जाएगी।

 

हर घड़ी को अपने हक़ में तुम लिखोगे किस तरह

जिसको ना चाहोगे तुम वो भी घड़ी आ जाएगी।

 

ख़ुशबुओं का दौर मुझमें गरचे जि़ंदा रह गया

मीर ग़ालिब की भी मुझ तक शायरी आ जाएगी।

 

 

 

पूछता ख़ाली पड़ा घर, कौन उसके साथ है

साथ वो सबके रहा पर, कौन उसके साथ है।

 

छोड़कर कुनबा उड़ानों के लिए आ तो गया

सोचता है अब कबूतर, कौन उसके साथ है।

 

जीत ली दुनिया मगर माँ को नहीं समझा सका

है खड़ा तन्हा सिकंदर, कौन उसके साथ है।

 

मैं हूँ दरिया और प्यासे लोग हैं मेरे क़रीब

हो भले ही वो समंदर, कौन उसके साथ है।

 

आज तो ख़ुद को इलाही मानकर चलता है वो

एक दिन पूछेगा महशर, कौन उसके साथ है।

 

पास हैं उसके दुआएं, इल्म हैं, ईमान है

पूछ मत पागल सुखनवर, कौन उसके साथ है।

 

 

 

हाथ में मेरे जब तक उसका दामन था

अंधियारों में रस्ता मेरा रोशन था।

 

घर की छत पर अंगारों की बारिश थी

नीचे लेकिन फूलों वाला आंगन था।

 

कैसे माँ की आँखें बूढी हो जातीं

उसकी आँखों में तो मेरा बचपन था।

 

कुछ दिन ठहरा वो तन-मन के सहरा में

लौट गया तब लगा मुझे वो सावन था।

 

उसके ख़यालों और तसव्वुर में उसके

जाने कौनसी ख़ुशबू वाला चंदन था।

 

साँसें टूट गयीं वो फिर भी साथ रहा

उसके मेरे बीच कुछ ऐसा बंधन था।

 

उसके आगे मैं ही तो था नाबीना

वर्ना उसका चेहरा तो इक दर्पण था।

 

 

 

बाद करने के जिसे दिल कहे अच्छा ना किया

हमने वो काम कभी भूल के सोचा ना किया।

 

जिनसे तन्हाईयाँ आबाद हुआ करती हैं

ऐसे लम्हात का हमने कभी पीछा ना किया।

 

इश्क़े नाकाम की दुनिया ने जब वजह पूछी

अपने महबूब को हमने कभी रूसवा ना किया।

 

साथ अपने वो समंदर भी लिए लौट आता

शिद्दते-प्यास को हमने ही तो पैदा ना किया।

 

इश्क़ में हमने वफ़ादारियां सिखाईं जिन्हें

अपनी चाहत का कभी उनसे भी चर्चा ना किया।

 

जिस्मो जाँ बेच के भी हमने बचाया है ज़मीर

अपनी ख़ुशबू का कभी दोस्तों सौदा ना किया।

 

 

 

जब नबी के घर की तुझमें रोशनी आ जाएगी

तुझमें जीने के लिए ख़ुद जि़ंदगी आ जाएगी।

 

सीख ले बंदा नवाज़ी का चलन सरकार से

ख़ुद-ब-ख़ुद अल्लाह की भी बंदगी आ जाएगी।

 

इक तबस्सुम की नज़र मासूम असगर के लिए

मेरे बच्चों के भी होंठों पर हंसी आ जाएगी।

 

जा नहीं सकता मदीना तो दरे ख़्वाजा पे आ

ढूँढने तुझको तेरी हर इक ख़ुषी आ जाएगी।

 

पढ़ रहा हूँ शेर नाते पाक़ के ये सोचकर

मेरे सज़दों में कभी पाक़ीज़गी आ जाएगी।

 

अब्रे रहमत मुस्तफ़ा का जब उमड़ कर आएगा

हिन्दुओं के घर भी रहमत की नदी आ जाएगी।

 

ए-अताओं के समंदर एक क़तरा दे मुझे

मेरी सैराबी से तुझमें क्या कमी आ जाएगी।

 

 

 

दरे मुस्तफ़ा पे मैं जाऊं कभी तो

ग़मे दिल नबी को सुनाऊं कभी तो।

 

मेरे घर भी आ जाओ या मेरे मौला

मैं राहों में पलकें बिछाऊँ कभी तो।

 

तेरे नूर का एक ज़र्रा ही दे दे

मैं सूरज को चेहरा दिखाऊँ कभी तो।

 

मैं हिन्दु तो हूँ पर मैं काफिर नहीं हूँ

ये दिल चीर कर मैं बताऊं कभी तो।

 

ना काबा गया, ना नज़ब, ना मदीना

तसव्वुर में ही देख आऊँ कभी तो।

 

क़यामत के दिन मुझको जलवा दिखाना

मैं रोते हुए मुस्कुराऊँ कभी तो।

 

उसे अपनी आँखों का सुरमा बना लूं

तेरे पांव की धूल पाऊँ कभी तो।

 

 

 

शहर मदीना से लौटे हो वहां का मंज़र कैसा है

जलवा-ए-जाना, दो आलम के आका का घर कैसा है।

 

गुम्बद-ए-ख़ज्रा के साए में नूर बरसता है कैसे

गलियों में गाते हए फिरना अल्लाह-हो-अक़बर कैसा है।

 

मौला की निस्बत में जि़ंदा रहने वाले लोगों में

किसी ने पूछा तो होगा कि शाहे संज़र कैसा है।

 

तुम रसूल के नक़्षे-पा की धूल तो लाए होंगे ही

माथे पर मल कर देखूंगा मेरा मुक़द्दर कैसा है।

 

दुख़ के सहराओं में अपनी उम्र कटी अब बतालाओ

हर इक क़तरे में शामिल रहमत का समंदर कैैसा है।

 

यहाँ ज़मीनें ख़ून से लथपथ, वहां ज़मीनें हैं कैसी

यहाँ का अम्बर आग उग़लता वहां का अम्बर कैसा है।

 

नूरे ख़ुदा का दोनों जहां में वो ही अकेला मालिक है

बतला देना लोग जो पूछें मेरा पयंबर कैसा है।

 

 

 

दीद-ए-तर ख़ून में भीगे हुए पर आ गए

क़र्बला होकर तख़्युल के कबूतर आ आए।

 

जब ज़ुबां में आ गया नामे हुसैन इब्ने अली

जेहन में कर्बोबला के सारे मंज़र आ गए।

 

हश्र तक ऐसी नमाज़ें कोई पढ सकता नहीं

प्यास के जौहर नमाज़ों में सिमट कर आ गए।

 

हिन्द में आए नहीं शब्बीर तो क्या हो गया

उनके घर का नूर लेकर शाहे संजर आ गए।

 

अ-चतुर्वेदी है घर-घर तबसरा शब्बीर का

हिन्दुओं के घर भी रहमत के समंदर आ गए।

 

 

 

मेरी बातों में उसका नूर जैसे आ गया है

मुझे सरकार की निस्बत ने ये तोहफ़ा दिया है।

 

मैं सूखा पेड़ था लेकिन हरा होने लगा हूँ

किसी ने जब से मुझपे या मुहम्मद लिख दिया है।

 

हुई आबाद जबसे मुस्तफ़ा की याद इसमें

मेरा दिल भी मुहम्म्द का मदीना हो गया है।

 

मुसलसल आ रही है सिम्ते तयबा से हवायें

उन्हीं की ख़ुशबुओं से तो चमन महक़ा हुआ है।

 

कहाँ से लाऊँ में अपने भरोसे का सफ़ीना

रसूले पाक़ पर मुझको भरोसा हो गया है।

 

मुझे हसनेन के बाबा तसव्वुर में मिले थे

नज़र में तबसे मेरे मुस्तफ़ा ही मुस्तफ़ा है।

 

मेरे आका ग़ुलामी उम्र भर तेरी करूंगा

तेरे मंगते का तुझसे ही गुज़ारा हो रहा है।

 

 

 

दरे ख़्वाजा पे हर ग़म का मदावा देख लेता हूँ

मदीना जा नहीं सकता मदीना देख लेता हूँ।

 

मुझे ख़्वाजा की चैखट पे मिली है ऐसी बीनाई

अँधेरों के सफ़र में भी उजाला देख लेता हूँ।

 

इसी दरबार में कर्बोबला, तयबा नज़ब जन्नत

बताऊँ क्या तुझे वाहिद में क्या-क्या देख लेता हूँ।

 

समझ लेता हूँ ख़्वाजा से मेरे निस्बत नहीं इसको

किसी साइल का जब मैं ख़ाली कासा देख लेता हूँ।

 

यहाँ फरज़ाने, दीवाने, सभी इक साथ रहते हैं

इसी अजमेर में सारा तमाशा देख लेता हूँ।

 

तमन्ना जागती है दिल में तो कहता हूँ या ख़्वाजा

नहीं होते हुए पूरी तमन्ना देख लेता हूँ।

 

किसी से जब भी मिलता हूँ तो मैं यूँ ही नहीं मिलता

‘सुरेन्दर‘ पहले में उसका वसीला देख लेता हूँ।

 

 

 

हो गए मक्कार जैसे दिन

दो-मुही तलवार जैसे दिन।

 

उम्र से लम्बे हुए लम्हे

चीन की दीवार जैसे दिन।

 

दुश्मनों में दोस्त हंै शामिल

हो गए गद्दार जैसे दिन।

 

मंदिरों सी देह थी जिसमें

कट गए व्यभिचार जैसे दिन।

 

ख़ून की स्याही से छापे हैं

दर्द के अख़बार जैसे दिन।

 

सज रहे हैं देखिए अब तो

रात के बाज़ार जैसे दिन।

 

जि़ंदगी थी चार दिन लेकिन

कब कटे दो-चार जैसे दिन।

 

 

 

हो कभी जब हक़ अदा करना

मत किसी से मशवरा करना।

 

मंजि़लें दुनिया बता देगी

रास्तों का तुम पता करना।

 

जब फ़क़ीरी से ही निस्बत है

क्या अमीरी की दुआ करना।

 

आ गया है जब अँधेरों को

रोशनी पर तबसरा करना।

 

जब दुआऐं दांव पर हों तब

कितना मुश्किल है ख़ता करना।

 

पत्थरों से ज़्यादा मुश्किल है

आईनों का सामना करना।

 

या ख़ुदा ग़म लाख दे देना

हौसला लेकिन अता करना।

 

 

 

तेरे दीदार की आका मैं हसरत ले के आया हूँ

मैं अपनी रूह में तेरी जियारत लेके आया हूँ।

 

यक़ीनन एक दिन देखूंगा मैं जलवा-ए-जाना को

तेरे दीदार की नज़रों में शिद्दत ले के आया हूँ।

 

नहीं बुझती है पल भर भी तलब शहरे मुहम्मद की

तसव्वुर में नबी के घर की ज़ीनत ले के आया हूँ।

 

जेहन में उड रहे हैं ख़ाके तयबा के कई मंज़र

जमाले रूहे ताबा की अक़ीदत ले के आया हूँ।

 

नहीं चाहा कभी भी ताज़पोशी हो मेरी यारब

तेरा ख़ादिम हूँ मैं झोली खि़दमत ले के आया हूँ।

 

 

 

तेरे अहसास का गर रूह से रिश्ता नहीं होता

किसी का हो भी जाता तू मगर मेरा नहीं होता।

 

नहीं उगता बदन से रोशनी का पेड़ नूरानी

ज़मीं ने गर अँधेरों में मुझे गाड़ा नहीं होता।

 

तुम्हारे नाम से इज़्ज़त मुझे देती है ये दुनिया

जुड़े होते ना तुम मुझसे तो ये रूतबा नहीं होता।

 

कसर बंदानवाज़ी में ही अपनी रह गई वरना

हमारे और तुम्हारे बीच में पर्दा नहीं होता।

 

तेरे ही आईने का अक़्ष है अच्छाईयां मेरी

बुरा होता अगरचे तू तो मैं अच्छा नहीं होता।

 

सज़ाये काट आया हूँ किसी के मैं गुनाहों की

हर इक इंसान में इतना बड़ा गुर्दा नहीं होता।

 

लड़ाई मौत से लड़ते हैं अपने हौसले वरना

जिगर की बात करने से जिगर पैदा नहीं होता।

 

 

 

जब तक वो वीरान रहा था

ख़ुद को ही पहचान रहा था।

 

उंगली कल थामी थी जिसकी

वो भी मुट्ठी तान रहा था।

 

यही सोच कर जान बख़्स दी

कभी वो मेरी जान रहा था।

 

कुचल दिया है जिसे भीड़ ने

रस्ता वो सुनसान रहा था।

 

जिस झौंके से आग लगी थी

अपनी ग़लती मान रहा था।

 

वहीं खड़ा हूँ सही सलामत

जहां कभी तूफ़ान रहा था।

 

डुबो दिया था कश्ती ने तो

तिनके का अहसान रहा था।

 

 

 

अब के मौसम में नहीं दर्द रूलाने आए

अब के मौसम में मुझे ख़्वाब सुहाने आए।

 

अब के मौसम में बहारों ने अजब खेल किया

याद की शाख पे कुछ पत्ते पुराने आए।

 

अब के मौसम में, बुरे वक़्त ने यूँ करवट ली

घर की दहलीज़ पे ख़ुद गुज़रे ज़माने आए।

 

अब के मौसम में परिंदों ने मेरा घर देखा

सूने आंगन में मेरे, वक़्त बिताने आए।

 

अब के मौसम में खुला दिन ये मदरसे की तरह

उंगलियां थाम के जज़्बात पढ़ाने आए।

 

अब के मौसम में फ़क़ीरों ने दी दुआयें फिर

मेरी झोली में भी जन्नत के ख़ज़ाने आए।

 

अब के मौसम में नहीं दिल ये बदहवास हुआ

बात मुद्दत ही सही होश ठिकाने आए।

Yeh Samandar Sufiyana Hai-Part Two

Posted by surendrachaturvedighazal on September 12, 2012 at 1:20 AM Comments comments (0)

 

बदन से हो के गुज़रा रूह से रिश्ता बना डाला

किसी की प्यास ने आखि़र मुझे दरिया बना डाला।

 

उसे सोचूँ, उसे ढूँढू, उसे लिक्खुँ मुक़द्दर में

फ़क़त इसके लिए उसने मुझे तन्हा बना डाला।

 

मैं आँखें खोल दुंगा तो जुदा हो जाएगा मुझसे

यही इक ख़ौफ़ था जिसने मुझे अंधा बना डाला।

 

तेरी आँखों में मैंने अश्क़ अपने क्या रखे तूने

समंदर को ज़रा सी देर में क़तरा बना डाला।

 

कभी बादल, कभी बारिश, कभी उम्मीद के झरने

तेरे अहसास ने छू कर मुझे क्या-क्या बना डाला।

 

तेरी मौजूदगी ने ज़ख़्म पर जब उंगलियाँ रक्खीं

तो मैंने दर्द अपना और भी गहरा बना डाला।

 

ख़यालों में तेरे हाज़ी हुए हम एक दिन यूँ भी

मदीना दिल को, अपनी रूह को काबा बना डाला।

 

अज़ब फि़तरत है मैं ख़ुद की निगहबानी में डरता हूँ,

समंदर हूँ मगर बहते हुए पानी से डरता हूँ।

 

खि़ज़ाओं के कई रिश्ते जुड़े हैं जिस्म से मेरे

मगर मैं रूह के भीतर की वीरानी से डरता हूँ।

 

तू ही तो है जो मुझको सर कटाने ही नहीं देता

मगर ये कौन कहता है कि क़ुर्बानी से डरता हूँ।

 

कभी कुनबे के आगे हाथ फैलाता नहीं हूँ मैं

मैं बचपन से ही माँ की हर पशेमानी से डरता हूँ।

 

मुझे रंगों को छू कर देखने की है बुरी आदत

मगर मैं तितलियों की हर परेशानी से डरता हूँ।

 

तू ऐसा लफ़्ज़ है जिसमें रहा हूँ उम्र भर जि़ंदा

मगर फिर भी न जाने क्यों तेरे मानी से डरता हूँ।

 

 

 

समंदर हूँ मगर भीतर मैं अपने बह रहा हूँ

बदन में आग है और रूह तक डूबा हुआ हूँ।

 

नज़र आते हैं मुझमें अक़्सं यूँ तो पत्थरों के

मगर सच तो यही है फि़तरतन मैं आईना हूँ।

 

अजब इक अजनबी मुझको नज़र आता है ख़ुद में

मैं जब भी दूर होकर ख़ुद को ख़ुद में देख़ता हूँ।

 

कोई तो है जो मेरी सोच में रहता हैं जि़ंदा

कोई तो है जिसे साँसों में रखकर पालता हूँ।

 

कोई तो है जिसे तन्हाईयाँ पहचानती हैं

कोई तो है जिसे ख़ामोशियों में ढालता हूँ।

 

नहीं देखा है जिसका नूर यूँ मैंने कभी भी

मगर मैं उसका हिस्सा हूँ फ़क़त ये जानता हूँ।

 

दुआओं में मुझे दहरो-हरम मिलते रहे हैं

फ़क़ीरों के बदन में आज तक जि़ंदा रहा हूँ।

 

 

 

निहत्थों को जो आकर हाथ में तलवार दे दे

कहानी को ख़ुदा ऐसा कोई कि़रदार दे दे।

 

कबीला आ गया है फिर से अपनी प्यास लेकर

इसे अब सर कटाने को कोई सरदार दे दे।

 

कशिश मिलने की साँसों में तू रख यारब सलामत

भले ही सामने फिर कोई भी दीवार दे दे।

 

मेरी तन्हाईयों को बख़्स दे तू उम्र लम्बी

मेरी ख़ामोशियों को दर्द का इज़हार दे दे।

 

मेरी रूसवाईयां कब तक मेरे पीछे चलेंगी

किसी इक मोड़ पर इनको नया हक़़दार दे दे।

 

सुकूँ बेचैनियों को इश्क़़ में लेने ना दे जो

मेरे पहलू में तू ऐसा दिले-बेज़ार दे दे।

 

मैं तेरे दर पे दूँ जब हाज़री दम टूट जाए

मेरी चाहत को ये शिद्दत ख़ुदा इक बार दे दे।

 

 

 

न नफ़रत में मिली है ना अदावत में मिली है

ये नेमत रूह की हमको मुहब्बत में मिली है।

 

खड़े हो जिन चराग़ों के लिए तुम मुफ़लिसों में

इन्हें ख़ुद रोशनी शाही हिफ़ाज़त में मिली है।

 

ये माना आज की जाग़ीर के सुल्तान हो तुम

मगर ये सल्तनत तुमको बग़ावत में मिली है।

 

तुम्हारी मुट्ठियों में गर है दरिया ख़ानदानी

हमें भी प्यास की शिद्दत विरासत में मिली है।

 

कहाँ वो मिल सकी मुझको कभी देहरो-हरम में

तसल्ली जो मुझे माँ की मोहब्बत में मिली है।

 

बड़ी मुद्दत से हम लौटे नहीं अपने बदन में

हमें ये बेख़ुदी सूफ़ी जियारत में मिली है।

 

मुहब्बत के लिए सर काट कर आता है देना

हमें जि़ंदादिली बचपन से आदत में मिली है।

 

 

 

तू अपने आप से घबरा गया ना

बिछुड़ कर दूर ख़ुद से आ गया ना।

 

बहुत बचकर तू ख़ुद से चल रहा था

मगर बचते हुए टकरा गया ना।

 

मुक़द्दर को तू पढ़ना चाहता था

लक़ीरों में तुझे उलझा गया ना।

 

अँधेरों पर यक़ीं तुझको नहीं था

उजालों से भी धोका खा गया ना।

 

कहा था आईनों से दूर रहना

अब आके सामने शरमा गया ना।

 

गया था रूह से रिश्ता निभाने

बदन में लौट के फिर आ गया ना।

 

ये साँसें तो हवाओं का सफ़र है

तुझे झौंका यही समझा गया ना।

 

 

 

दुआ ये कर कि जब मेरा सितमगर साँस लेता हो

बदन फूलों का हो जिसमें कि नश्तर साँस लेता हो।

 

मुझे मेरी तरह के दूसरे दरिया से तू मिलवा

कि हर क़तरे में जिसके इक समंदर साँस लेता हो।

 

हुसैनी हो सिफ़त जिसकी लहू ऐसा अता कर दे

उतर कर जिस्म में जिसके कि ख़ंजर साँस लेता हो।

 

कभी तो दे मुझे ए वक़्त तू ऐसा कोई लम्हा

बसाकर जिसको साँसों में मेरा घर साँस लेता हो।

 

नज़र तू ही बता उसको कहाँ से ढूँढ कर लाऊँ

कि जिसको देखकर दुनिया का मंज़र साँस लेता हो।

 

जुदा होकर मैं तुझसे यूँ तो जि़ंदा हूँ मगर ऐसे

कि जैसे जिस्म से काटा हुआ सर साँस लेता हो।

 

बनाओ अब कहीं ऐसी इबादतग़ाह कि जिसमें

दरो-दीवार का हर एक पत्थर साँस लेता हो।

 

 

 

मुझमे ऐसा पश्मंज़र है

खंडर के पीछे भी घर है।

 

ख़ामोशी हूँ मैं इक ऐसी

जिसे टूट जाने का डर है।

 

पथरावों का मौसम हूँ मैं

पत्थर के पीछे पत्थर है।

 

कौन लदा कंधों पर मेरे

अगर ज़मीं पे मेरा सर है।

 

कैसे मुझसे बता लड़ेगा

पीछे तू आगे लश्कर है।

 

बन ना सका अहसास मगर वो

लम्हा मेरा हम बिस्तर है।

 

मेरा मरना जादू जैसा

तेरा जीना एक हुनर है।

 

 

 

तन्हाईयों को पास बुलाकर भूल गया

मैं ख़ुद को आवाज़ लगाकर भूल गया।

 

रात हमेशा मुझसे यूँ नाराज़ रही

नींदों को कुछ ख़्वाब दिख़ाकर भूल गया।

 

कुछ लफ़्ज़ों के मानी मुझे बदलने थे

ख़ामोशी होठों तक लाकर भूल गया।

 

बाहर तो पहचान लिया था मैंने भी

लेकिन ख़ुद को घर पर आकर भूल गया।

 

मुर्दा लम्हों से मिलकर कब तक रोता

कुछ यादें दरिया में बहाकर भूल गया।

 

फिर से पांव उसी पत्थर पे रक्खा है

पागल हूँ जो ठोकर ख़ाकर भूल गया।

 

 

 

तू ही गरचे तीरगी देगा

कौन मुझको रोशनी देगा

 

ढूँढ लो छोटा कोई दरिया

ये समंदर तिश्नगी देगा।

 

इश्क़ पर करके यक़ीं देखो

दर्द को दीवानगी देगा।

 

नफ़रतें देंगे तुम्हें अपने

प्यार तुमको अजनबी देगा।

 

आज तो दी है सज़ा उसने

मौत मुझको फिर कभी देगा।

 

 

 

सुख-दुख़ को अंजाना मत कह

अपने हैं बेगाना मत कह।

 

या तो मत कह मुझको बादल

या ख़ुद को वीराना मत कह।

 

मुझको मान हक़़ीक़त अपनी

नया कोई अफ़साना मत कह।

 

कर मुझको महसूस भी ख़ुद में

या अपना याराना मत कह।

 

नषा इश्क़ का हूँ मैं लेकिन

रिश्तों का मयख़ाना मत कह।

 

तुझमें गुम हो जाऊँ तब भी

मुझको तू दीवाना मत कह।

 

अंतहीन है सफ़र हमारा

इसको आना-जाना मत कह।

 

 

 

वक़्त से हारी हुई सच्चाईयां दे दे मुझे

अपने हिस्से को भी तू रूसवाइयाँ दे दे मुझे।

 

आयतों में ढाल दूंगा, मैं तेरे अहसास को

तू फ़क़त भीतर छिपी तन्हाइयाँ दे दे मुझे।

 

मुझमें ज़ख़्मों के हरे जंगल कई मौजूद हैं

सोच मत अपनी भी तू वीरानियां दे दे मुझे।

 

बर्फ़ का मौसम बदन में देखना आ जाएगा

धूप में जलती हुई परछाईयाँ दे दे मुझे।

 

जब बहारों को ही मैं महसूस कर पाया नहीं

कैसे यह कह दूं ख़ुदा रानाईयां दे दे मुझे।

 

रहमतों का तू समंदर है तो फिर इतना भी कर

अपने इक क़तरे की ही गहराइयाँ दे दे मुझे।

 

कुछ तो मुझको भी तू अपनी रोशनी कर दे अता

कुछ तो अपने नूर की नूरानियाँ दे दे मुझे।

 

 

 

दिखने में ऊँचाई हूँ

मैं कैसी गहराई हूँ

 

सज़दे में ताउम्र रहा

मैं जिसकी रूसवाई हूँ।

 

वारिस मेरा कोई नहीं

मैं कैसी तन्हाई हूँ।

 

कर ना सका साबित कोई

फिर भी मैं सच्चाई हूँ।

 

रिश्तों ने ओढ़ा मुझको

मैं इक फटी रजाई हूँ।

 

जिस्म नहीं कोई मेरा

मैं कैसी परछाई हूँ।

 

जिसको माँ ने ख़र्च किया

मैं वो खरी कमाई हूँ।

 

 

 

ज़मीं पे जन्नत माँग रहा है

कैसी मन्नत माँग रहा है।

 

पलकों पे आंसू ठहरे हैं

दर्द वसीयत माँग रहा है।

 

रूह खड़ी सज़दे में हाजि़र

इश्क़ अक़ीदत माँग रहा है।

 

सहरा पानी लिए खड़ा है

प्यास की शिद्दत माँग रहा है।

 

ज़ख़्मों के बाज़ार में आकर

दर्द भी क़ीमत माँग रहा है।

 

साबित ख़ुद को कर देगा वो

झूठ हक़़ीक़त माँग रहा है।

 

 

 

बादलों ने प्यार से सौ बार समझाया मुझे

दिल मगर जलते हुए जंगल में ले आया मुझे।

 

एक लम्हा भी अलग ख़ुद से नहीं होने दिया

अजनबी कहता रहा लेकिन मेरा साया मुझे।

 

उस की चाहत में हुआ तक़सीम मेरा इश्क़ यूँ

जिस्म ने माँगा मुझे और रूह ने पाया मुझे।

 

खो गया था मैं किसी दश्ते-जुनूँ में दोस्तों

बेख़ुदी ने मुस्तफ़ा के दर पे पहुंचाया मुझे।

 

मैं मुक़म्मल इक ग़ज़ल कुछ इस तरह से हो गया

हादसों ने मुझको लिक्खा वक़्त ने गाया मुझे।

 

हर घड़ी कुछ आहटें पीछे मेरे चलती रहीं

उम्र भर गुज़रे हुए लम्हों ने तड़पाया मुझे।

 

पार इस दरिया को करके कोई भी लौटा नहीं

जब लगा मैं डूबने तो ये ख़याल आया मुझे।

 

 

 

फ़क़ीरी में भी अपनी बादशाही क्यूँ नहीं देता

मुझे तू रहमतों की वो कमाई क्यूँ नहीं देता।

 

मेरी तन्हाइयों में हर तरफ बिखरी है ख़ामोशी

तेरा आना बता फिर भी सुनाई क्यूँ नहीं देता।

 

गवाही दे रही है तेरी ख़ुशबू है बदन में तू

मगर झाकूं जो ख़ुद में तो दिखाई क्यूँ नहीं देता।

 

कई रिश्ते मेरे हक़़दार हैं लेकिन मुझे अक़्सर

सिवा तेरे कोई अपना सुझाई क्यूँ नहीं देता।

 

ज़माने भर के मुझ पे रोज़़ ही इल्ज़ाम लगते हैं

मगर हैरान हैं दुनिया, सफ़ाई क्यूँ नहीं देता।

 

बुराई लाख हैं मुझमें बुरा भी हूँ बहुत लेकिन

बुराई के मैं बदले में बुराई क्यूँ नहीं देता।

 

परिंदों की तरह आज़ाद रहने की दुआ देकर

बदन से रूह को यारब रिहाई क्यूँ नहीं देता।

 

 

 

मुझे वो फ़ासलों से देख़ता है

परिंदा सब्ज़ शाख़ों से ख़फ़ा है।

 

बदन उजड़ी हुई मस्जि़द हो जैसे

जहाँ दुख़ का कबूतर बोलता है।

 

ख़ज़ाना हूँ मगर ख़ैरात जैसा

मुझे पाक़र हर इक ये सोचता है।

 

नहीं सूरज हूँ जब ये कह दिया तो

वो मुझसे रोशनी क्यूँ माँगता है।

 

नहीं ख़ुद से कभी मैं मिल सका हूँ

मुझे नाहक़ ही क्यों तू ढूँढता है।

 

मेरे चेहरे के पीछे मैं नहीं हूँ

जो दिख़ता है वो कोई दूसरा है।

 

 

 

सूफ़ी संत की नीयत जैसा

मेरा इश्क़ अक़ीदत जैसा।

 

उसका रिश्ता नज़र में मेरी

चिट्ठी लिखी खैरियत जैसा।

 

दर्द में डूबा किस्सा-ए-ग़म

भूली हुई वसीयत जैसा।

 

पलक पे ठहरा मेरा आंसू

ख़ानदान की इज़्ज़त जैसा।

 

ज़ुबां पे आई बात का लहज़ा

उजड़े घर की क़ीमत जैसा।

 

नींद में मेरे ये कौन आया

ख़्वाब भी लगे हक़़ीक़त जैसा।

 

मिलता तो रहता है लेकिन

खोई हुई कैफ़ीयत जैसा।

 

 

 

सदियों की मैं जान हूँ जैसे

ग़ालिब का दीवान हूँ जैसे।

 

ख़ुद में रहने से डरता हूँ

भीतर से वीरान हूँ जैसे।

 

आसमान ढूँढा करता हूँ

उड़ने का अरमान हूँ जैसे।

 

ऐसे सज़ा हुआ हूँ घर में

रिश्तों का गुलदान हूँ जैसे।

 

कितनी आँखें घूर रहीं हैं

मुफ़लिस का ईमान हूँ जैसे।

 

दफ़न हैं इतनी मुर्दा यादें

जि़ंदा कब्रिस्तान हूँ जैसे।

 

कभी-कभी तो ये लगता है

ख़ुद पे ही अहसान हूँ जैसे।

 

 

 

सामने अब मेरे आईना आ गया

हाथ से छूट कर टूटना आ गया।

 

उसके अहसास में डूबने जब लगा

ख़ुद के अहसास में तैरना आ गया।

 

उससे मिलते हुए जब बिछुड़ मैं गया

ख़ुद में जब कुछ मुझे ढूँढना आ गया।

 

नूर उसका तसव्वुर में क्या दिख गया

मुझको हर पल दुआ माँगना आ गया।

 

हसरतें वस्ल की जब जवां हो गई

सोते-जगते उसे सोचना आ गया।

 

ठोकरों में रहीं फिर सभी चैखटें

उसकी चैखट को जब चूमना आ गया।

 

इस समंदर को जब छू लिया प्यास ने

बारिशों में उसे भीगना आ गया।

 

 

 

न कोई जिस्म था मेरा न कोई चेहरा था

किसी तरह से मगर मैंने ख़ुद को ढूँढा था।

 

नहीं हिरण था कोई मुझमें ना थी कस्तूरी

ख़याल कोई था जिसमें बदन महक़ता था।

 

खड़े थे हाथ में पत्थर लिए जहां वाले

पराए सब थे मगर तू तो मेरा अपना था।

 

नहीं था पास मेरे कोई जिसको देता सदा

मिला था ख़ुद से मैं जिस वक़्त बहुत तन्हा था।

 

बिछुड़ते वक़्त मुझे जिस नज़र से देख लिया

नज़र में क़ैद मेरे सिर्फ़ वो ही लम्हा था।

 

किसी के सोच में शामिल नहीं था मैं लेकिन

मेरे ख़याल से होकर कोई गुज़रता था।

 

न जानें कौन था जो मुझको जिस्मों-जाँ देकर

बदन में मेरे कभी जीता कभी मरता था।

 

 

 

नहीं पंछी कोई जब बोलता है

मेरी शाखों पे किसका घौंसला है।

 

जहां ख़्वाबों के बच्चे सो रहे हैं

कोई तलवार लेकर घूमता है।

 

लहू से सुर्खतर मिट्टी है अब भी

बदन मेरा है या कि क़र्बला है।

 

फ़क़त चेहरे पे ले आता है ग़ुस्सा

बड़ी ख़ामोशियों से चीख़ता है।

 

हुई है दोस्ती ऐसी दुख़ों से

उन्हें वो साथ लेकर नाचता है।

 

खुली आँखों से जो दिख़ता नहीं है

वो आँखें बंद करके देख़ता है।

 

 

 

तू जबसे मेरी पहचान हुआ

उस घड़ी से मैं सुल्तान हुआ।

 

आबाद हुआ जब भीतर से

तो बाहर से वीरान हुआ।

 

बिन साए के तू साथ रहा

मैं देख के ये हैरान हुआ।

 

मंसूर, समद, तबरेज़ी के

पीछे जो चला क़ुर्बान हुआ।

 

तू साथ रहा तो जीना क्या

मरना भी बहुत आसान हुआ।

 

बरसा जब नूर इलाही तो

उसका ये करम अहसान हुआ।

 

हर ग़ज़ल में लगा महक़ने तू

तब जाके मेरा दीवान हुआ।

Yeh Samandar Sufiyana Hai-Part One

Posted by surendrachaturvedighazal on September 12, 2012 at 1:10 AM Comments comments (0)

 

कोई भी राज़ तेरा ये समझा पाया नही है।

हज़ारों जिस्म है तेरे कोई साया नहीं है।

 

अगर चाहे तो आकर तू मुझे आबाद कर दे

मेरी तन्हाईयों का कोई सरमाया नहीं है।

 

नहीं दर पे सिवा तेरे किसी के मैं गया हूँ।

सिवा तेरे कोई भी घर मेरे आया नहीं है।

 

लिखे हैं आंसुओ ने ही मेरे अहसास लेकिन

मेरी ख़ामोषियों को दर्द ने गाया नहीं है।

 

ये सच है इष्क़ तेरा है सफ़र बस बेख़ुदी का

गया है जो कभी वो लौट कर आया नहीं है।

 

सभी को वक़्त ही देता रहा धोके हमेषा

कभी धोका किसी से वक़्त ने खाया नहीं है।

 

 

 

ख़ुद में कितना डूब गया है

षायद मुझको सोच रहा है।

 

जिस्म अंधेरे में है गुमसुम

धूप में साया खड़ा हुआ है।

 

महक रही है उसकी ख़ुषबू

मेरे नाम में क्या रक्खा है।

 

कौनसी दुनिया में रहता हूँ

दुनिया ने आकर पूछा है।

 

क्यों टाँगू खिड़की पर पर्दे

मेरा सच तो बेपर्दा है।

 

मैं फ़कीर की मुट्ठी जैसा

मत पूछो मुट्ठी में क्या है।

 

तुमने तो देखा है उसको

क्या वो भी मेरे जैसा है।

 

 

 

मेरी उम्मीद के तालाब अक्सर सूख जाते हैं

भरी बरसात में सर-सब्ज़ मंज़र सूख जाते हैं।

 

न जाने कौनसा सहरा है मेरी माँ की आँखों में

जिन्हें छूने से अष्क़़ों के समंदर सूख जाते हैं।

 

बदलते वक़्त की तासीर मैं समझा नहीं कैसे

लहू से तरबतर होकर भी ख़ंजर सूख जाते हैं।

 

दुआओं से बुजुर्गों की हरे होते हैं बंजर भी

ख़फ़ा होते हैं जब पुरखे मुक़द्दर सूख जाते हैं।

 

बुरे मौसम में दरियाओं की जब तौहीन होती है

बहा करते हैं बाहर और भीतर सूख जाते हैं।

 

 

 

घुटनों में सर छिपा के रोया

वो दुनिया को हँसा के रोया।

 

उसका ग़म कितना गहरा था

हरदम शोर मचा के रोया।

 

ऐसा पहली बार हुआ वो

नकाब अपना हटा के रोया।

 

बचा नहीं पाया लोगों से

दामन पाक़ जला के रोया।

 

देख न लें घर की दीवारें

सारे दीप के बुझा के रोया।

 

मजबूरी में रोया मुफ़लिस

और वो दौलत कमा के रोया।

 

हँसी आ गई रोते-रोते

जब वो मुझको रूला के रोया।

 

 

 

उम्र भर वो बुझते शोलों को हवा देता रहा

घर में अपने आंधियों को आसरा देता रहा।

 

उसने रिश्तों में मुझे जो कुछ दिया सब भूलकर

दिल बुजुर्गों की तरह उसको दुआ देता रहा।

 

जानता था लौटकर वापस सदा आ जाएगी

फिर भी मैं अंधी गुफाओं में सदा देता रहा।

 

क्या ग़ज़ब कि़स्मत थी मेरी सोचता हूँ आज भी

मुझसे सब कुछ छीनकर, सबको ख़ुदा देता रहा।

 

जिनकी मंजि़ल मैं नहीं हूँ ये हक़ीक़त जानकर

ये तो मैं ही था कि उनको रास्ता देता रहा।

 

उनको ख़ुषियाँ उम्र भर मिलती रहें ये सोचकर

रंजो ग़म को अपने घर का मैं पता देता रहा।

 

उम्र भर रिश्ते निभाये इस तरह से दोस्तों

ग़लतियां जिनकी भी हों ख़ुद को सज़ा देता रहा।

 

 

 

सर झुकाने को मैं तैयार नहीं हो पाया

यूं बुलंदी का मैं हक़दार नहीं हो पाया।

 

फ़ैसले तेरे मेरी रूह को समझा ना सके

तू ये कह ले मैं वफ़ादार नहीं हो पाया।

 

निभ ना पाए हों अलग बात है रिश्ते मेरे

मैं मगर जिस्म का बाज़ार नहीं हो पाया।

 

सबकी आँखों के बहे अष्क़़ मेरी आँखों से

ग़म का अपने कभी इज़हार नहीं हो पाया।

 

तुझको अफ़सोस अगर है तो मुझे भी है ये

मैं तेरे शहर का कि़रदार नहीं हो पाया।

 

बेगुनाही मैं भी मैं तेरा गुनहगार नहीं

तू ख़ता करके ख़तावार नहीं हो पाया।

 

 

 

फ़ैसलों में अपनी ख़ुद्दारी को क्यों जि़ंदा किया

उम्र भर कुछ हसरतों ने इसलिए झगड़ा किया।

 

मिल के सारी मछलियाँ रहती जहाँ थी चैन से

एक मछली ने उसी तालाब को गंदा किया।

 

मुझसे होकर तो उजाले भी गुज़रते थे मगर

इस ज़माने ने अंधेरों का फ़क़त चर्चा किया।

 

उम्र क़ैदी की तरह घर में उसे रहना पड़ा

दोस्तों ने उसको आखि़र किस क़दर रूसवा किया।

 

कुछ बुजुर्गों ने मिटा कर नफ़रतों के ज़हर को

गाँव के कँुए का पानी प्यार से मीठा किया।

 

मैंने जब ख़ामोश रहने की हिदायत मान ली

तोहमतें मुझ पर लगा कर आपने अच्छा किया।

 

कुछ नहीं हमने किया रिश्ता निभाने के लिए

अब ज़रा बतलाइये कि आपने क्या-क्या किया।

 

 

 

ख़ुदाया इससे पहले कि रवानी ख़त्म हो जाए

रहम ये कर मेरे दरिया का पानी ख़त्म हो जाए।

 

मैं जि़ंदा हूं मुझे इस बात का या तो यक़ीं दे दे

वगरना अब ये मेरी बदगुमानी ख़त्म हो जाए।

 

हिफ़ाज़त से रखे रिश्ते भी टूटे इस तरह जैसे

किसी ग़़फ़लत मेें पुरखों की निशानी ख़त्म हो जाए।

 

लिखावट की ज़रूरत आ पड़े इससे तो बेहतर है

हमारे बीच का रिश्ता जुबानी खत्म हो जाए।

 

लड़ा होगा भला कितना वो ख़ुद से आदमी जिसकी

फ़क़त बचपन बिताने में जवानी ख़त्म हो जाए।

 

मुझे ख़ामोशियों ऐसे किसी इक लफ़्ज़ में ढालो

जुबाँ पे जिसके आने से ही मानी ख़त्म हो जाए।

 

हज़ारों ख़्वाहिशों ने ख़ुदकुशी कुछ इस तरह से की

बिना कि़रदार के जैसे कहानी ख़त्म हो जाए।

 

 

 

पशेमाँ हूँ कि दिल से ये पशेमानी नहीं जाती

मगर अपनों के आगे मुट्ठियां तानी नहीं जाती।

 

मैं जब भी झांकता हूं अपनी माँ की बूढ़ी आँखों में

मेरी आँखों से बचपन की वो शैतानी नहीं जाती।

 

बहारें चंद दिन आती हैं, आकर लौट जाती हैं

मकाँ मालिक बनी बैठी ये वीरानी नहीं जाती।

 

मैं अपने शहर में रहकर हुआ यूँ अजनबी ख़ुद से

कि अपनी शक़्ल अब ख़ुद से भी पहचानी नहीं जाती।

 

सबक सिखला गया है कर्बला का वाक़या मुझको

कभी बेकार में प्यासों की क़ुर्बानी नहीं जाती।

 

मेरे मौला ने मुझको बख़्स दी है सल्तनत ऐसी

फ़क़ीरी में भी रहता हूँ तो सुल्तानी नहीं जाती।

 

न जाने मुझमें कितनी ख़ुशबुएँ कपड़े बदलती हैं

बदन से फिर भी मेरे बू-ए-रूहानी नहीं जाती।

 

 

 

बड़े अंदाज़ से वो बोलता है

मगर ख़ुद को कहां वो खोलता है

 

चखे तो शहद सा लगता है मीठा

ज़हर भी इस तरह से घोलता है।

 

तराज़ू की तरह रखता है दिल को

वो रिश्ते गिन्नियों से तोलता है।

 

उफनता वो नहीं है दूध जैसा

मगर भीतर बहुत वो खौलता है।

 

कभी तन्हाईयों में सोचता हूं

ये मन क्यों नर्तकी सा डोलता है।

 

हुनर आया है जबसे बोलने का

बहुत ख़ामोश होकर बोलता है।

 

 

 

ख़ुदा चराग़ की जब लौ बुझाने लगता है

चराग़ ख़ुद के उजालों को खाने लगता है।

 

हमारी प्यास को कतरों में तोलने वालों

ज़रा सी देर में सागर ठिकाने लगता है।

 

मैं पूरे क़द से निकलता हूं राह में लेकिन

कोई तो है जो मेरा क़द घटाने लगता है।

 

ज़रा सी धूप जो आती है मेरे रस्ते में

मेरा ही साया मुझे आज़माने लगता है।

 

गुज़रता जब भी है उसका ख़याल छू के मुझे

फ़क़ीर मुझमें कोई मुस्कुराने लगता है।

 

नबी के हु़क़्म की तामील जब भी करता हूँ

ज़मीर ख़ुद मुझे कलमा पढ़ाने लगता है।

 

मैं जब भी दूर बहुत दूर ख़ुद से होता हूं

न जाने कौन मेरे पास आने लगता है।

 

 

 

अपनी रज़ा में उसकी रज़ा बोलने लगे

सर इस तरह झुका कि ख़ुदा बोलने लगे।

 

शिद्दत तू मेरे इश्क़ में इतनी तोे दे ख़ुदा

मैं चुप रहूं तो मुझमें वफ़ा बोलने लगे।

 

मेरा वजूद कुछ भी हो दुनिया के सामने

तन्हा रहूँ तो मुझमें ख़ता बोलने लगे।

 

पुरखों को भूलता नहीं ये सोचकर कभी

मुश्किल में जब पडूँ तो दुआ बोलने लगे।

 

ख़ुशबू है मेरी रूह में इक ऐसे फूल की

छू ले जो मेरा जिस्म हवा बोलने लगे।

 

तब तक मुझे गुनाह की देते रहो सज़ा

मैं बेख़ता हूं जब ये सज़ा बोलने लगे।

 

उस पल मेरी निगाह में बस तू हो सामने

जब जि़ंदगी का नाम क़ज़ा बोलने लगे।

 

 

 

जिस्म के बाहर मैं ख़ुशियाँ ढूंढने जाता नहीं

मेरे भीतर के सुकूँ का कोई अंदाज़ा नहीं।

 

इश्क़ की ऐसी हवेली में हुआ हूँ बंद मैं

खिड़कियाँ जिसमें हज़ारों कोई दरवाज़ा नहीं।

 

बुझ चुकी है मुझमें अब सारी चितायें दर्द की

रूह तक मैं ज़ख़्म मेरे कोई भी ताज़ा नहीं।

 

मुझको लगता है समंदर सैकड़ों पी जाऊँगा

जैसे मेरी प्यास के आगे कोई प्यासा नहीं।

 

फ़ैसला जलने का मैंने कर लिया आखि़र क़बूल

मैं मगर सायों के पीछे धूप में भागा नहीं।

 

जिस घड़ी ख़ुद से बिछुड़कर तुझमें शामिल मैं हुआ

बाद उसके उम्र भर मैं लौट कर आया नहीं।

 

सूखे रिश्तों का पुराना पेड़ हूं मैं दोस्तों।

मैं तो साया हूं मगर मेरा कोई साया नहीं।

 

 

 

इस तरह का अंदाज़ मेरे देखने में था

उसका वजूद जैसे मेरे आईने में था।

 

सजदे में तेरे मैक़शी का था सरूर वो

मुझको लगा कि जैसे किसी मैक़दे में था।

 

कैसी अजीब शर्त थी मेरे हबीब की

रखनी थी जि़ंदा प्यास सफर भीगने में था।

 

मेरे नसीब में थी लिखी मौत प्यास की

वरना तो बहता दरिया मेरे रास्ते में था।

 

इक दिन मैं तेरे इश्क़ में पहुँचूँगा तुझ तलक

मंजि़ल का मेरी मुझको पता बचपने में था।

 

उसको छुआ भी, देखा पर वो मजा कहाँ

जितना मजा कि उसको फ़क़त सोचने में था।

 

मेरी ग़ज़ल ही बस उसे महसूस कर सकी

ख़ामोष सा जो दर्द मेरे टूटने में था।

 

 

 

पंछियों का आना-जाना है

जिस जगह अपना ठिकाना है।

 

डूबना हो तो चले आओ

ये समंदर सूफि़याना है।

 

हम फ़क़ीरों की दुआओं में

ख़ुशबुओं वाला ख़जाना है।

 

रहमतों से लद रही शाख़ें

ये शजर कितना पुराना है।

 

दूसरा भी ये कोई हममें

ये बदन तो ज़ाहिरना है।

 

जिस्म से रिश्ता है रूहानी

बा-अदब इसको निभाना है।

 

साथ रहकर भी नहीं देखा

किस कदर वो ग़ायबाना है।

 

 

 

रूबरू जब हुआ सच्चाईयों से

दोस्ती हो गई तन्हाइयों से।

 

निकलता अब नहीं धूप मेें वो

बहुत नाराज़़ है परछाइयों से।

 

ढलेंगे अष्क़ ये शेरों में इक दिन

जुड़े हैं दर्द की गहराइयों से।

 

छिपाकर रख लिया पाक़ीज़गी को

तआर्रूफ़ जब हुआ रूसवाईयों से।

 

मुक़द्दर हो गया वीरान जंगल

मगर रिश्ता रहा रानाइयों से।

 

वो फिर इक बार उड़ना चाहता है

गिरा था जो कभी ऊँचाईयों से।

 

दुआ में माँ की ख़ुषबू क्यों नहीं है

वो अक़्सर पूछता है भाईयों से।

 

 

 

मेरा कि़रदार जब कोई कहानी ढूंढता है

मुझे लगता है वो पत्थर में पानी ढूंढता है।

 

नज़र आता है जब उसको कहीं कोई घरौंदा

वो अपने घर में क्यूं चीज़ें पुरानी ढूंढता है।

 

जमीं की हर हक़ीक़त से वो होता है मुख़ातिब

तजुर्बे फिर भी अक़्सर आसमानी ढूंढता है।

 

जिन्हें सुनता रहा बचपन में वो माँ की जुबानी

उन्हीं लफ़्ज़ों में वो दुनिया के मानी ढूंढता है।

 

कहानी जिस्म के बाज़ार मेें दम तोड़ भी दे

मगर कि़रदार सारे ख़ानदानी ढूंढता है

 

 


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